ग्वीदो रेनी

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लेख सूचना
ग्वीदो रेनी
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 4
पृष्ठ संख्या 98
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक रामप्रसाद त्रिपाठी
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1964 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक लेखराज सिंह

ग्वादो रेनी (1775-1642) बोलोन्या स्कूल का इतालीय चित्र कार। इटली में जब कला का ह्रास हो रहा था ग्वीदो रेनी एक ऐसा नक्षत्र उदित हुआ जो कला क्षेत्र में खूब चमका। समकालीन कलाकारों से उसे बड़ी प्रेरणा मिली। सुप्रसिद्ध कलाकार कारावाज्जो के टेकनीक के विपरीत वह सामान्य रूपांतरों के गुंफित छायाभास को उभारने में प्रयत्नशील रहा। रोम में लगभग 20 वर्षों तक वह रहा। पाँचवे पाल की छत्रछाया में उसने खूब यश कमाया। उसने शाही महल की प्राचीर पर एक विशाल भित्तिचित्र का निर्माण किया जो बड़ा ही शानदार और भव्य बन पड़ा। स्थानीय मोंते कैवेलो चैपल में उस चित्रण का काम मिला, पर उसके स्वरूपानुरूप व्यवस्था न होने से वह नाराज होकर लौट गया। पाल ने उसे बड़े आग्रह से पुन: बुलाया। नेपुल्स में संत जेनेरो गिर्जाघर के प्रसंग में रिबेरा और दूसरे कलाकारों के दिए गए दंड से बचने के लिये वह पहले राम, फिर बोलोन्या चला अया। बोलोन्या में उसने एक कलाविद्यालय की स्थापना की जिसमें सैकड़ों शिष्यों प्रशिष्यों को उसने कला की ओर प्रेरित किया। किंतु रेनी को जुए का दुर्व्यसन था। इससे उसे पर्याप्त आर्थिक क्षति उठानी पड़ती थी। अस्थिरचित्त होने से कलासाधना और काम करते वक्त उसका उत्साह कभी कभी शिथिल और मंद पड़ जाता था। इससे उसके व्यवसाय और ख्याति पर धब्बा आता था। प्राय: त्वरा में आँके गए अपरिपक्व चित्रों को उसने बेचने के लिये विवश होना पड़ता था। इससे उसकी ख्याति पर भी अँच आई। अंत में उसने अपनी सेवाएँ एक चित्रव्यवसायी को बेच दीं, फलत: प्रचलित रूढ़ियों, पुनरावृत्ति और व्यावसायिक दृष्टिकोण ने उसकी तीखी दृष्टि और कलाकरिता को कुंठित कर दिया। बोलोन्या में असहाय अवस्था में उसकी मृत्यु हुई।

उसने प्राय: धार्मिक और पौराणिक चित्रों का निर्माण किया। उसके कुछ व्यक्तिचित्रण और इचिंग चित्र भी हैं। उसके पहले के चित्रों में कलात्मक संस्पर्श, कोमल अनुभूति, सुष्ठु व्यंजना और शैलीगत मार्दव अधिक है, पर बाद में अभाव और दुर्व्यसन उसकी सृजनचेतना पर छाते गए। बोलोन्या, ड्रेस्डन, मिलान, बर्लिन, म्यूनिक, रोम, लावेर और लंदन की नेशनल गैलरी में आज भी उसके कितने ही चित्र सुरक्षित हैं।


टीका टिप्पणी और संदर्भ