ताड़

अद्‌भुत भारत की खोज
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ताड़ (Palm) एकदलीय, पामेसी (Palmacae) कुल का पौधा है। आज से लगभग २०,००,००० वर्ष पूर्व 'तृतीय युग' (Tertiary period) में, विश्व के अधिकाधिक भागों में इसके पाए जाने की पुष्टि, ग्रीनलैंड, कैनाडा तथा जापान में पाए गए फासिलों (fossils) द्वारा होती है। आजकल ताड़ कुल के पौधे अधिकतर उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। इसकी कुछ जातियाँ यूरोप, चीन, जापान तथा अमरीका में भी पाई जाती हैं। इसके लगभग २०० वंश (genera) की २,००० जातियों (species) में से ३४ वंश की जातियाँ भारत में पाई जाती हैं।

यूरोप में कामीरॉप्स ह्युमिलिस (Chamaerops humilis) जाति के ताड़ भूमध्यसागरीय प्रदेशों (स्पेन, इटली, यूनान) में पाए जाते हैं। उष्ण कटिबंधीय अमरीका तथा एशिया में ताड़ वेस्ट इंडीज तथा चिली तक, और एशिया से बोर्नियो तथा आस्ट्रेलिया तक वितरित हो गया है। अफ्रीका में ताड़ मे केवल ११ वंश मिलते हैं। हिमालय में नेनराफस वंश के पौधे मिलते हैं, जो अफगानिस्तान तथा जापान तक वितरित हो गए हैं। ताड़ की कुछ जातियाँ मरुस्थलीय तथा दलदली स्थानों में पाई जाती हैं।

इन्हें वातावरण की दृष्टि से जीरोफाइट, मीजोफाइट तथा हाइड्रोफाइट की श्रेणीयों में विभाजित किया जा सकता है। समुद्र के किनारे के उष्ण प्रदेशों में इन पौधों की प्रचुरता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ताड़ के फल समुद्री लहरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थानों तक पहुँचाए जाते हैं।

ताड़ कुल के पौधे का तना गोल तथा काफी लंबा और सीधा होता है। तने पर शाखाएँ प्राय: नहीं होती है, पर कुछ में सूखे डंठल के कारण खुरदरी हो जाती हैं। किन्हीं किन्हीं ताड़ में काँटे भी पाए जाते है। किसी किसी जाति का तना बहुत पतला होता है, पर अधिकतर ये काफी मोटे होते हैं। पतले तने वाले ताड़ लता की तरह सहारा लेकर अन्य पेड़ों पर चढ़ते हैं और कभी कभी १०० मीटर तक लंबे हो जाते हैं। अधिकतर ताड़ के तने मजबूत होते है और १५-२० मीटर तक ऊँचे भी होते है। पत्तियाँ तने के ऊपरी भाग में पाई जाती है। पेड़ के निचले भाग से बहुत सी अस्थानिक जड़ें (adventitious roots) निकलती हैं, जो पौधें को सहारा और आहार प्रदान करती हैं। तने अधिकतर रेशेदार होते हैं।

मिट्रॉक्सिलॉन (Metroxylon) जाति के ताड़ के तने से प्राप्त साबूदाना खाने के उपयोग में लाया जाता है। कैलामस (Calamus) जाति में तना जमीन के अंदर रहता है और उसी में से डालियाँ सतह के ऊपर निकलकर पेड़ का रूप धारण कर लेती हैं। तने के अंदर बहुत से वाहक वलयक (vascular stands) पाए जाते हैं निका आकार तथा क्रम अन्यान्य एकदलीय पौधों का सा रहता है।

ताड़ में पत्तियाँ कम, पर काफी बड़ी, होती हैं। ये दो तीन से. मी. से लेकर दो तीन मीटर तक हो सकती हैं। इस वर्ग के पौधों में दो प्रकार की पत्तियाँ मिलती हैं : १. पाणिवत्‌ (Palmate) तथा २. पक्षवत्‌ (pinnate)। पत्तों के डंठल बहुत कड़े तथा मजबूत होते है और तने के पास पहुँचकर चौड़े हो जाते हैं। इनमें पतझड़ नहीं होता, अपितु पुरानी पत्तियाँ सूखकर अपने भार तथा हवा के कारण गिर जाती हैं। कभी कभी पत्तियों के डंठल तने में काँटे की तरह लगे रह जाते हैं।

पत्ती की सतह अधिकतर जातियों में चिकनी होती है, परंतु किसी किसी जाति के ताड़ में पत्तियाँ काँटेदार होती हैं। ताड़ की पत्तियाँ सूखने पर कागज की तरह चिकनी हो जाती हैं। इसीलिए प्राचीन काल में इनपर लिखा जाता था। अब भी ताड़पत्र पर लिखे गए पुराने ग्रंथ कहीं कहीं मिल जाते हैं।

पुष्पक्रम (inflorescence) प्राय: बड़ा तथा गुच्छेदान होता है। कोरिफा जाति के ताड़ में तने के शिखर पर पुष्पक्रम निकलने के उपरांत, फल बनने एवं पकने के समय तक इतना अधिक आहार निचले भागों से शोषित कर लिया जाता है कि पौधा मर जाता है।

अत: इस जाति के पौधे अपने जीवनकाल में केवल एक बार ही फूलते तथा फलते हैं, परंतु इसके विपरीत ताड़ की अन्य जातियों में पुष्मक्रम तने पर, पत्तियों की धुरी के पास से, निकलते हैं। पुष्मक्रम प्रारंभ में नाव के आकार के पृथुपर्ण (spathe) ढका रहता है, पर पुष्पक्रम का डंठल बड़ा हो जाने पर पृथुपण से बाहर निकल आता है। पुष्पक्रम के डंठल पर अनेक एकलिंगी एवं द्विलिंगी पुष्पक्रम पाए जाते हैं। तीन प्रकार के पुष्पक्रम पाए जाते हैं: (१) नर पुष्पक्रम, (२) मादा पुष्पक्रम तथा (३) द्विलिंगी पुष्पक्रम; जिनमें नर तथा मादा दोनों फूल होते हैं।

पुष्पक्रम के डंठल पर नर तथा मादा फूल अलग अलग भागों में पाए जाते हैं। रेफिया जाति के ताड़ में पुष्पक्रम के डंठल के ऊपरी भाग में नरपुष्प तथा निचले में मादा पाए जाते हैं। पर जिनोमा जाति में पुष्पक्रम के डंठल पर तीन तीन रहते हैं, जिनमें पध्य में मादा पुष्प तथा उसके दोनों तरु नर पुष्प होते हैं।

पुष्प

नर पुष्प मादा पुष्प से छोटे होते हैं। इनमें छह पंखुड़ियाँ कड़ी तथा स्थायी किस्म की होती हैं। इनका रंग हरा, पीला अथवा सफेद होता है। नर पुष्प में प्राय: छह पुंकेसर तथा पादा पुष्प में एक अंडाशय, अथवा कभी कभी, अंडाशय रहते हैं। जब अंडाशय एक ही होता है तो, उसमें एक या तीन खंड होते है और प्रत्येक खंड में बीजाणु होता है। नारियल में एक ही स्त्रीकेसर होता है, क्योंकि और दो स्त्रीकेसर दब जाते हैं। नारियल के फल से जटा निकालने के बाद, कड़े भाग पर की तीनों आँखें अंडाशय में तीन स्त्रीकेसर की उपस्थिति की द्योत हैं।

फूलों के पूर्णरूपेण विकसित हो जाने पर परागण की क्रिया होती हैं, जिसमें पराग वायु अथवा कीड़ों द्वारा मादा पुष्प के वर्तिकाग्र (stigma) पर पहुँच जाते हैं। इस क्रिया के कुछ काल (कभी कभी एक वर्ष) पश्चात्‌ फल पक जाता हे। इसका उदाहरण खजूर, नारियल तथा रेफिया है। इनमें बीज एक से लेकर तीन तक होते हैं। बीज प्राय: गोल, पर कभी कभी लंबा भी, होता है, जिसका उदाहरण सुपारी है।

बीज कुछ काल तक जमीन में रहने के बाद उचित वातावरण पाकर अंकुरित होता है। पहले जड़ांकुर तथा बीजोधर बीज के बाहर जमीन के अंदर बढ़ने लगते हैं। तत्पश्चात्‌ बीजपत्र के बढ़ाव से जड़ कभी कभी ३० सेंटीमीटर जमीन के नीचे पहुँच जाती है, जिससे नए पौधे को उचित मात्रा में खाद्य पदार्थ प्राप्त होने लगता है। बीजपत्र एक भाग बीज में रहता हैं और उससे भी नए पौधे को कुछ खाद्य पदार्थ प्राप्त हो जाता है। प्रांकुर से पहले दो नीन पत्तियाँ पीले रंग की निकलती हैं, जो जमीन के अंदर ही रह जाती हैं। जमीन के ऊपर निकलनेवाली पहली हरी पत्ती साधारण होती है, परंतु बाद में निकलनेवाली पत्तियाँ नारियल या खजूर की पत्तियाँ नारियल या खजूर की पत्तियों की भाँति हो जाती है।

ताड़ वर्ग के पौधे निम्नलिखित में लाए जाते हैं: तने का कभी कभी शहतीर की तरह उपयोग करते हैं। मिट्रॉक्सिलॉन के तने से साबूदाना बनाया जाता है। एरीक समीडा की, जिसे गोभी ताड़ कहते हैं, अग्रस्थ कली का साग बनाया जाता हे। ताड़ से ही मादक पेया ताड़ी भी प्राप्त होती है। ताड़ के तने के ऊपरी भाग पर थोड़ा काट देने पर उससे रस निकलता है। यह ताड़ रस है। इसमें प्रकाश और वायु की क्रिया से किण्वन होता है। इसमें प्राप्त द्रव को ताड़ी कहते हैं। ताड़ी में ऐल्कोहल रहता है। ताड़ के रस से अब शक्कर तथा मिस्री बनाने लगे हैं। किण्वन से पहले ही रस से शक्कर और मिस्री बनाते हैं। अकिण्वित ताड़ रस को नीरा कहते हैं। यह पौष्टिक पेय है। इसमें विटामिनों के अतिरिक्त ग्लूकोज, फ्रक्टोज़ो, और अल्प मैंगनीज़ पाया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। ताड़ की पत्ती से मकान छाते हैं तथा डलिया, चटाई, हैट इत्यादि भी बनाते हैं। भारत में रामेश्वरम्‌ के पास ताड़ की पत्ती के डंठल को पास पास गाड़कर लोग बगीचों तथा मकानों की हदबंदी भी करते हैं।

ताड़ के फल से गरी, खजूर, रेशा और बीज से तेल, निकालते हैं। रेशा गद्दी भरने तथा रस्सी बनाने के काम में आता है और फूल के कड़े भाग से हुक्का बनाते हैं। फाइटेलिफैस (Phytelephas) के कड़ भूूणशेष से हाथीदाँत जैसा पदार्थ बनाते हैं। कुछ ताड़ से मोम जैसा पदार्थ भी प्राप्त होता है।

ए० बी रेंडल, (सन्‌ १९५६ को ताड़ कुल को निम्नलिखित सात जातियों में बाँटा है:

  1. फीनिक्स डैक्टाइलीफेरा (Phoenix dactylifera) इसमें खजूर होता है। इस जाति में नर तथा मादा पुष्प में तीन अलग स्त्रीकेसर होते हैं, जिनमें से केवल एक ही बीज धारण करता है और शेष दो सूख जाते हैं। इसका फल गूदेदार होता हे। फल में एक कड़ा लंबा बीज होता है, जो अंदर से एक नाली द्वारा दो भागों में विभाजित होता है।
  2. सबलेई के पुप्प में तीन हुड़ हुए, या पृथक्‌, स्त्रीकेसर होते हैं, जिनमें से प्राय: एक ही तथा कभी कभी दो या तीनों ही फल बन जाते है। फूल गूदेदार अथवा रेशेदार होता है। भ्रूणपोष कड़ा होता है।
  3. बोरेसेइर् (Borasseme) के पेड़ बड़े होते हैं। मादा फूल नर से बड़ा होता है। मादा फूल में तीनों स्त्रीकेसर मिलकर एक बड़ा फूल बनाते हैं, जिसमें एक से लेकर तीन तक बीज होते हैं। फल का आंतरिक भाग कड़ा हो जाता है तथा बीचवाला भाग रेशेदार होता है। इसका उदाहरण नारियल है।
  4. लेपिडोकैरेई (Lepidecaryeae) का फल एकदलीय होता है। फल के ऊपर बहुत से कड़े चमकदार छोटे छोटे शल्क होते हैं। इसका उदाहरण मिट्रॉक्सिलॉन रंफिआई है।
  5. अरीकेई (Areceae) - इसके अंडाशय में एक से लेकर तीन तक खंड होते हैं। फल रेशेदार अथवा गूदेदार, एकदलीय होता है। इस वर्ग के पौधे अधिकतर उष्ण कटिबंधीय एशिया, आस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड में पाए जाते हैं।
  6. कोकेई - इस जाति में नीनों स्त्रीकेसर मिलकर फल बनाते हैं। फल में प्राय: एक ही बीज पाया जाता है। आंतरभित्ति कड़ी होती है और उसपर तीन आँखे रहती हैं। इसका उदाहरण नारियल (Cocos nucifera) है।
  7. फिटलेफनटेई - इसमें केवल दो उपजाति के पौधे सम्मिलित हैं। नर तथा मादा पुष्पक्रम अलग होते हैं, तना कमजोर एवं पत्तियाँ बड़ी होती हैं। उदाहरण फिटलेफस तथा नेषफ्राूटिकेंस।

टीका टिप्पणी और संदर्भ