महाभारत अनुशासनपर्व अध्याय 165 श्लोक 35-62

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पंचषष्ट्यधिकशततम (165) अध्याय: अनुशासनपर्व (दानधर्म पर्व)

महाभारत: अनुशासनपर्व: पंचषष्ट्यधिकशततम अध्याय: श्लोक 35-62 का हिन्दी अनुवाद

जो मनुष्य उपर्युक्त देवता आदि का कीर्तन, तवन और अभिनन्दन करता है, वह सब प्रकार के पार और भय से मुक्त हो जाता है। देवताओं की स्तुति और अभिनन्दन करने वाला पुरुष सब प्रकार से संकर पापों से छूट जाता है। देवताओं के अनन्तर समस्त पापों से मुक्त करने वाले तपस्या में बढ़े-चढ़े तप: सिद्ध ब्रह्मर्षियों के प्रख्यात नाम बतलाता हूँ। यवक्रीत, रैभ्य, कक्षीवान, औशिज, भृगु, अंगिरा, कण्व, प्रभावशाली मेधावतिथि और सर्वगुणसम्पन्न बर्हि ये पूर्व दिशा में रहते हैं। उल्मुचु, प्रमुचु, महाभाग मुमुचु, शक्तिशाली स्वस्तयात्रेय, मित्रवरुण के पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य और परम प्रसिद्ध ऋषि श्रेष्ठ दृढ़ायु तथा ऊर्ध्वबाहु- ये महाभाग दक्षिण दिशा में निवास करते हैं। अब जो पश्चिम दिशा में रहकर सदा अभ्युदयशील होते हैं, उन ऋषियों के नाम सुनो- अपने सहोदर भाइयों सहित उषंगु, शक्तिशाली परिव्याध, दीर्घतमा, ऋषि गौतम, काश्यप, एकत, द्वित, महर्षि त्रित, अत्रिके धर्मात्मा पुत्र दुर्वासा और प्रभावशाली सारस्वत। अब जो उत्तर दिशा का आश्रय लेकर अपनी उन्नति करते हैं, उनके नाम सुनो- अत्रि, वसिष्‍ठ, शक्ति, पराशरनन्दन शक्तिशाली व्यास, विश्वामित्र, भरद्वाज, ऋचीकपुत्र जमदग्रि, परशुराम, उद्दालक पुत्र श्वेतकेतु, कोहल, विपुल, देवल, देवशर्मा, धौम्य, हस्तिकाश्यप, लोमश, नाचिकेत, लोमहर्षण, उग्रश्रवा ऋषि और भृगुनन्दन च्यवन। राजन! यह आदि में होने वाले देवता और ऋषियों का मुख्य समुदाय अपने नाम का कीर्तन करने पर मनुष्य को सब पापों से मुक्त करता है। अब राजर्षियोंके नाम सुना- राजा नृग, ययाति, नहुष, यदु, शक्तिशाली पूरु, धुन्धुसार, दिलीप, प्रतापी सागर, कृशाश्व, यौवनाश्व, चित्राश्व, सत्यवान, दुष्यन्त, महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरत, पवन, जनक, राजा दृष्टराज, नरश्रेष्ठ रघु, राजा दशरथ, राक्षसहन्ता वीरवर श्रीराम, शशबिन्दु, भगीरथ, हरिशचंद्र, मरूत्त, राजा दृढरा, महादर्य, अलर्क, नराधिप ऐल (पुरूरवा), नरश्रेष्ठ करन्धम, राजा कध्मोर, दक्ष, अम्बरीष, कुकुर, महायशस्वी रैवत, कुरु, संवरण, सत्यपराक्रमी मान्धाता, राजर्षि मुचुकुन्द, गंगाजी से सेवित राजा जहु आदिराजा वेननन्दन पृथु, सबका प्रिय करने वाले मित्र भानु, राजा त्रसद्दस्यु, राजर्षि श्रेष्ठ श्वेत, प्रसिद्ध राजा महाभिष, राजा निमि, अष्टक, आयु, राजर्षि क्षुप, राजा कक्षेयु, प्रतर्दन, दिवोदास, कोसल नरेश सुदास, पुरूरवा, राजर्षि नल, प्रजापति मनु, हविध्र, पृषध्र, प्रतीप, शान्तनु, अज, प्राचीन बहॢ, महायशस्वी इक्ष्वाकु, राजा अनरण्य, जानुजंघ, राजर्षि कक्षसेन इनके अतिरिक्त पुराणों में जिनका अनेक बार वर्णर हुआ है, वे सब पुण्यातमा राजा स्मरण करने योगय हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान आदि से शुद्ध हो प्रात:काल और सांयकाल इन नामों का पाठ करता है, वह धर्म के फल का भागी होता है। देवता, देवर्षि और राजर्षि- इनकी स्तुति की जाने पर ये मुझे पुष्टि, आयु, यश ओर स्वर्ग प्रदान करेंगे, क्योंकि ये ईश्वर (सर्वसमर्थ स्वामी) हैं। इनके समरण से मुझ पर किसी विघ्नका आक्रमण न हो, मुझपे पाप न बने। मेरे ऊपर चारों और बटमारों का जोर न चले। मुझे इस लोक में सदा चिरस्थायी जय प्राप्त हो और परलोक में भी शुभ गति मिले।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्म पर्व में देवता आदि के वंश का वर्णन नामक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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