महाभारत द्रोण पर्व अध्याय 133 श्लोक 1-19

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त्रयस्त्रिंशदधिकशतकम (133) अध्याय: द्रोण पर्व (जयद्रथवध पर्व)

महाभारत: द्रोण पर्व: एकत्रिंशदधिकशतकम अध्याय: श्लोक 1-19 का हिन्दी अनुवाद

भीमसेन और कर्ण का युद्ध, कर्ण के सारथि सहित रथ का विनाश तथा धृतराष्ट्र पुत्र दुर्जय का वध

धृतराष्ट्र बोले - संजय ! मैं भीमसेन के पराक्रम को अत्यन्त अद्भुत मानता हूँ कि उन्होंने समरांगण में शीघ्रता पूर्वक पराक्रम दिखाने वाले कर्ण के साथ भी युद्ध किया। संजय ! जो कर्ण रण क्षेत्र में युद्ध के लिये सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्रों को धारण करके सुसज्जित हुए देवताओं तथा यक्षों, असुरों और मनुष्यों का भी निवारण कर सकता है, वह युद्ध में विजय - लक्ष्मी से सुशोभित होते हुए से पाण्डु नन्दन कुन्ती कुमार भीमसेन को कैसे नीं लाँघ सका ? इसका कारण मुझे बताओ। उन दोनों में प्राणों की बाजी लगाकर किस प्रकार युद्ध हुआ ? मैं समझता हूँ कि यहीं उभय पक्ष की जा अथवा विजय निर्भर है। सूत ! रण क्षेत्र में कर्ण को पाकर मेरा पुत्र दुर्योधन श्रीकृष्ण तथा सात्यकि आदि यादवों सहित समस्त कुन्ती कुमारों को जीतने का उत्साह रखता है। समरांगण में भयंकर कर्म करने वाले भीेमसेन के द्वारा कर्ण के बारंबार पराजित होने की बात सुनकर मेरे मन पर मोह सा छा जाता है। मेरे पुत्र की दुर्नीतियों के कारण मैं समस्त कौरवों को नष्ट हुआ ही मानता हूँ।
संजय ! कर्ण कभी महाधनुर्धर कुन्ती कुमारों को नहीं जीत सकेगा। कर्ण ने पाण्डु पुत्रों के साथ जो जो युद्ध किये हैं, उन सब में पाण्डवों ने ही रण क्षेत्र में कर्ण को जीता है। तात ! इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी पाण्डवों पर विजय पाना असम्भव है; परंतु मेरा मूर्ख पुत्र दुर्योधन इस बात को नहीं समझता है। मेरा पुत्र कंबेर के समान कुन्ती कुमार युधिष्ठिर कके धन का अपहरण करके ऊँचे स्थान से मधु लेने की इच्छा ले मूर्ख मनुष्य के समान पतन के भय को नहीं समझ रहा है। वह छल - कपट की विद्या को जानता है। अतः छल से ही उन महामनस्वी पाण्डवों के राज्य का अपहरण करके उसे जीता हुआ मानकर पाण्डवों का अपमान करता है । मुझ अकृतात्मा ने भी पुत्र स्नेह के वशीभूत होकर सदा धर्म पर स्थित रहने वाले पाण्डवों को ठगा है। दूरदर्शी युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित संधि की अभिलाषा रखते थे; परंतु उनहें असमर्थ मानकर मेरे पंत्रों ने उनकी बात ठुकरा दी।
अतः संजय ! एक दूसरे के वध की इच्छा वाले युद्ध स्थल के श्रेष्ठ पीर कर्ण और भीमसेन ने समरांगण में जिस प्रकार युद्ध किया, वह सब मुझे बताओ। संजय ने कहा - राजन् ! कर्ण और भीमसेन के युद्ध का यथावत् वृत्तान्त सुनिये। वे दोनों जंगली हाथियों के समान एक दूसरे के वध के लिये उत्सुक थे। राजन् ! क्रोध में भरे हुए सूर्य पुत्र कर्ण ने कुपित हुए शत्रुदमन पराक्रमी भीमसेन को अपने बल पराक्रम का परिचय देते हुए तीस बाणों से बींध डाला। भरतश्रेष्ठ ! कर्ण ने चमकते हुए अग्रभाग वाले सुवर्ण जटित महान् वेगशाली बाणों द्वारा भीमसेन को घायल कर दिया। इस प्रकार बाण चलाते हुए कर्ण के धनुष को भीमसेन ने तीन तीखे बाणों द्वारा काट डाला और एक भल्ल मारकर सारथि को रथ की बैइक से नीचे पृथ्वी पर गिरा दिया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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