महाभारत भीष्म पर्व अध्याय 53 श्लोक 1-22

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त्रिपञ्चाशत्तम (53) अध्‍याय: भीष्म पर्व (भीष्‍मवध पर्व)

महाभारत: भीष्म पर्व: त्रिपञ्चाशत्तम अध्याय: श्लोक 1-22 का हिन्दी अनुवाद

धृष्टघुम्न तथा द्रोणाचार्य का युद्ध

धृतराष्ट्र ने पूछा- संजय! महाधनुर्धर द्रोणाचार्य तथा द्रुपदपुत्र धुष्टघुम्न ये दोनों वीर किस प्रकार प्रयत्नपूर्वक आपस में युद्ध कर रहे है, वह सब वृत्तान्त मुझसे कहो। मै तो पुरुषार्थ से अधिक प्रबल भाग्यों को ही मानता हूं। ओर इसी पर विश्वास करता हूं, जिसके अनुसार शान्तनुनन्दन भीष्म युद्ध में पाण्डुपुत्र अर्जुन से पार न पा सके। संजय! भीष्म रणक्षेत्र में कुपित हो जाये तो वे चराचर प्राणियों सहित सम्पूर्ण लोको को मार सकते है। फिर वे अपने पराक्रम द्वारा युद्ध में पाण्डुकुमार अर्जुन से क्यों न पार पा सके। संजय ने कहा! राजन् पाण्डवों को तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी नही जीत सकते । अब आप इस अत्यन्त भयंकर युद्ध का वृत्तान्त स्थिर होकर सुनिये। द्रोणाचार्य ने अपने तीखे बाणों से धृष्टघुम्न को घायल कर दिया और उसके सारथि भल्ल के द्वारा मारकर रथकी बैठक से नीचे गिरा दिया। आर्य! क्रोध में भरे हुए द्रोणाचार्य ने चार उत्तम सायको से धृष्टघुम्न के चारो घोडों को भी बहुत पीडा दी। तब धृष्टघुम्न ने हंसकर नब्बे पैने बाणों से द्रोणाचार्य को घायल कर दिया और कहा- ‘खडे़ रहो, खडे़ रहा’। तदनन्तर अमेय आत्मबल से सम्पन्न प्रतापी द्रोणाचार्य ने पुनः अमर्षशील धृष्टघुम्न को अपने बाणों से ढक दिया। तत्पश्चात् धृष्टघुम्न का अन्त कर डालने की इच्छा से द्वितीय कालदण्ड के समान एक भयंकर बाण हाथ में लिया, जिसका स्पर्श इन्द्र के वज्र के समान कठोर था। भरतनन्दन! युद्ध में द्रोणाचार्य के द्वारा उसबाण का संधान होता देख सम्पूर्ण पाण्डवसेना में महान् हाहाकार मच गया। उस समय मैंने वहां धृष्टघुम्न अद्भूत पराक्रम देखा। वह वीर समरांगण में अकेला ही पर्वत के समान अविचल भाव से खडा रहा। अपने लिये मृत्यु बनकर आते हुए उस भयंकर तेजस्वी बाण को देखकर धृष्टघुम्न ने तत्काल ही उसे काट गिराया और द्रोणाचार्य पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। धृष्टघुम्न के द्वारा किये हुए उस अत्यन्त दुष्कर कर्म को देखकर पाण्डव सहित समस्त पांचाल वीर हर्ष से कोलाहल कर उठे। तदनन्तर द्रोणाचार्य की मृत्यु चाहनेवाले पराक्रमी वीर धृष्टघुम्न ने उसके ऊपर सुवर्ण और वैदूर्यमणि से भूषित अत्यन्त वैगशालिनी शक्ति चलायी । उस सुर्गणभूषित शक्ति को सहसा आती देख द्रोणाचार्य ने समरभूमि मैं हॅसते-हॅसते उसके तीन टुकडे़ कर दिये। जनेश्वर ! अपनी शक्ति को नष्ट हुई देख प्रतापी धृष्टघुम्न ने द्रोणाचार्य पर पुनः बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। तब महातेजस्वी द्रोण ने उस बाण-वर्षा का निवारण करके द्रुपदपुत्र के धनुष को बीच से ही काट डाला। धनुष कट जाने पर महायशस्वी बलवान वीर धृष्टघुम्न ने समरभूमि में द्रोणाचार्य पर एक लोहे की बनी हुई एक भारी गदा चलायी। द्रोणाचार्य के वध की इच्छा से वेगपूर्वक छोडी हुई वह गदा बडे़ जोर से चली; पर वहां हम लोगो ने उस समय द्रोणाचार्य का अद्भूत पराक्रम देखा। उन्होंने बडी फूर्ती से उस स्वर्णभूमि गदा को व्यर्थ कर दिया। इस प्रकार उस गदा को निष्फल करके द्रोणाचार्य ने धृष्टघुम्न पर सुवर्णमय पंखो से युक्त अत्यन्त तीक्ष्ण पानीदार और भयंकर ‘भल्ल’ नामक बाण चलाये । वे बाण धृष्टघुम्न का कवच छेदकर रणक्षेत्र में उनका रक्त पीने लगा। तब महातेजस्वी धृष्टघुम्न ने दूसरा धनुष लेकर युद्ध में पराक्रमपूर्वक पांच बाण मारकर द्रोणाचार्य को क्षत-विक्षत कर दिया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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