महाभारत वन पर्व अध्याय 279 श्लोक 1-17
एकोनाशीत्यधिकद्वशततम (279) अध्याय: वन पर्व (रामोख्यान पर्व )
रावण द्वारा जटायु का वध, श्रीराम द्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्ध का वध तथा उसके विरूप से वार्तालाप मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर ! महावीर गृधराज जटायु (सूर्य के सारथि) अरुण के पुत्र थे। उनके बड़े भाई का नाम सम्पाति था। राजा दशरथ के साथ उनकी बड़ी मित्रता थी। इसी नाते सीता को अपनी पुत्रवधू मानते थे। जब जटायु ने उन्हें रावण की गोद में पराधीन होकर पड़ी हुई देखा, तब उनके क्रोध की सीमा न रही। वे राक्षसराज रावण पर टूट पड़े। इस प्रकार और वे बोले - ‘निशाचर ! मिथिलेशकुमारी को छोड़ दे, छोड़ दे। मेरे जीते जी तू इन्हें कैसे हर ले जायगा ?। ‘यदि मेरी पुत्रवधू सीता को तू नहीं छोड़ेगा, तो मेरे हाथ से जीवित नहीं बच सकेगा।’ ऐसा कहकर जटायु ने अपने नखों से राक्षसराज रावण को बहुत घायल कर दिया। उन्होंने पंखों और चोंच से मार-मारकर उसके सैंकड़ों घाव कर दिये। रावण का सारा शरीर जर्जर हो गया तथा देह से रक्त की धाराएँ बह चलीं। मानो पर्वत अनेक झरनों से आर्द्र हो रहा हो। श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय एवं हित चाहने वाले जटायु को इस प्रकार चोट करते देख रावण ने तलवार लेकर उन पक्षिराज के दोनों पंख काट डाले। बादलों को भेदने वाले पर्वत-शिखर के समान गृधराज जटायु को घायल करके रावण पुनः सीता को गोद में लिये हुए आकाश मार्ग से चल दिया। विदेहकुमारी सीता जहाँ-जहाँ कोई आश्रम, सरोवर या नदी देखतीं, वहाँ-वहाँ अपना कोई -न-कोई आभूषण गिरा देती थीं। आगे जाने पर उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर बैइे हुए पाँच श्रेष्ठ वानरों को देखा। वहाँ उप बंद्धिमती देवी ने अपना एक अत्यन्त दिव्य वस्त्र गिरा दिया। वह सुन्दर पीले रंग का वस्त्र आकाश में उड़ता हुआ उन पाँचों वानरों के मध्यभाग में जा गिरा, मानो मेघों के बीच में विद्युत प्रकट हो गयी हो। आकाशचारी पक्षी की भाँति आकाशगामी रावण थोड़े ही समय में अपना मार्ग तय करके लंका के निकट जा पहुँचा। उसने दूर से ही अपनी रमणीय एवं मनोहर पुरी को देखा, जो अनेक दरवाजों से सुशोभित हो रही थी। साक्षात् विश्वकर्मा ने उस पुरी का निर्माण किया था। वह सब ओर से चहारदीवारी तथा खाइयों द्वारा घिरी हुई थी। राक्षसराज रावण ने सीता के साथ उसी लंकापुरी में प्रवेश किया। इस प्रकार सीता का अपहरण हो जाने पर बुद्धिमान श्रीरामचन्द्रजी उस महामृगरूप मारीच को मारकर लौटे; उस समय मार्ग में उन्हें लक्ष्मण दिखायी दिये। भाई को देखकर श्रीराम ने उन्हें कोसते हुए कहा- ‘लक्ष्मण ! राक्षसों से भरे हुए इस घोर जंगल में जानकी को अकेली छोड़कर तुम यहाँ कैसे चले आये ?’। ‘मुगरूपधारी राक्षस मुझे आश्रम से दूर खींच लाया और भाई भी आरम को अरक्षित छोड़कर मेरे पास आ गया’, यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन संतप्त हो उठे। उपर्युक्त रूप से लक्ष्मण की निन्दा करते हुए श्रीरामचन्द्रजी तुरंत उनके पास आ गये और कहने लगे- ‘लक्ष्मण ! मैं देखता हूँ, सीता जीवित भी है या नहीं। तब लक्ष्मण ने सीता की वे सारी अनुचित एवं आक्षेपपूर्ण बातें, जिन्हें उन्होंने अन्त में कहा था, कह सुनायी।
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