महाभारत शल्य पर्व अध्याय 25 श्लोक 1-20

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पंचविश (25) अध्याय: शल्य पर्व (ह्रदप्रवेश पर्व)

महाभारत: शल्य पर्व: पंचविश अध्याय: श्लोक 1-20 का हिन्दी अनुवाद

अर्जुन और भीमसेन द्वारा कौरवों की रथसेना एवं गजसेना का संहार, अष्वत्थामा आदि के द्वारा दुर्योधन की खोज, कौरव सेना का पलायन और सात्यकि द्वारा संजय का पकड़ा जाना

संजय कहते हैं- महाराज ! यद्यपि कौरवायोद्धा युद्ध से पीछे न हटने वाले शूरवीर थे और विजय के लिये पूरा प्रयत्न कर रहे थे तो भी उनके देखते-देखते अर्जुन ने गाण्डीव धनुष से उनके संकल्प को व्यर्थ कर दिया । जैसे बादल पानी की धारा गिराता है, उसी प्रकार वे बाणों की वर्षा करते दिखायी देते थे। उन बाणों का स्पर्श इन्द्र के वज्र की भाँति कठोर था। वे बाण असह्य एवं महान् शक्तिशाली थे । भरतश्रेष्ठ ! किरीटधारी अर्जुन की मार खाकर वह बची हुई सेना आपके पुत्र के देखते-देखते रणभूमि से भाग चली।। कुछ लोग अपने पिता और भाईयों को छोड़कर भागे तो दूसरे लोग मित्रों को। कितने ही रथों के घोडे़ मारे गये थे और कितनों के सारथि । प्रजानाथ ! किन्हीं के रथों के जूए, धुरे, पहिये और हरसे भी टूट गये थे, दूसरे योद्धाओं के बाण नष्ट हो गये और अन्य योद्धा अर्जुन के बाणों से पीड़ित हो गये । कुछ लोग घायल न होने पर भी भय से पीड़ित हो एक साथ ही भागने लगे और कुछ लोग अधिकांश बन्धु-बान्धवों के मारे जाने पर पुत्रों को साथ लेकर भागे । नरव्याघ्र ! कोई पिता को पुकारते थे, कोई सहायकों को । प्रजानाथ ! कुछ लोग अपने भाई बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियों को जहाँ-के-तहाँ छोड़कर भाग गये। बहुत से महारथी पार्थ के बाणों से अत्यन्त घायल हो मूच्र्छित हो रहे थे। अर्जुन के बाणों से आहत हो कितने ही मनुष्य रणभूमि में ही पडे़-पडे़ उच्छ्वास लेते दिखायी देते थे। उन्हें दूसरे लोग अपने रथ पर बिठाकर घड़ी-दो-घड़ी आश्वासन दे स्वयं भी विश्राम करके प्यास बुझाकर पुनः युद्ध के लिये जाते थे।। रणभूमि में उन्मत्त होकर लड़ने वाले कितने ही युद्धाभिलाषी उन घायलों को वैसे ही छोड़कर आपके पुत्र की आज्ञा का पालन करते हुए पुनः युद्ध के लिये चल देते थे ।भरतश्रेष्ठ ! दूसरे लोग स्वयं पानी पीकर घोड़ों की भी थकावट दुर करते। उसके बाद कवच धारण करके लड़ने के लिये जाते थे। अन्य बहुत से सैनिक अपने घायल बन्धुओं, पुत्रों और पिताओं को आश्वासन दे उन्हें शिविर में रख आते । उसके बाद युद्ध में मन लगाते थे । प्रजानाथ ! कुछ लोग अपने रथको रणसामग्री से सुसज्जित करके पाण्डव-सेवा पर चढ़ आते और अपनी प्रधानता के अनुसार किसी श्रेष्ठ वीर के साथ जूझना पंसद करते थे। वे शूरवीर कौरव-सैनिक रथ में लगे हुए किंकिणीसमूह से आच्छादित हो तीनों लोकों पर विजय पाने के लिये उद्यत हुए दैत्यों और दानवों के समान सुशोभित होते थे । कुछ लोग अपने सुवर्णभूषित रथों के द्वारा सहसा आकर पाण्डवसेनाओं में धृष्‍टधुम्न के साथ युद्ध करने लगे । पांचालराजपुत्र धृष्‍टधुम्न, महारथी शिखण्डी और नकुलपुत्र शतानीक-ये आपकी रथसेना के साथ युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर आपके सैनिकों का वध करने के लिये उद्यत हो विशाल सेना से घिरे हुए धृष्‍टधुम्न ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक आक्रमण किया । नरेश्वर ! भरतनन्दन ! उस समय आपके पुत्र ने आक्रमण करनेवाले धृष्‍टधुम्न पर बहुत-से बाणसमूहों का प्रहार किया।। राजन् ! आपके धनुर्धर पुत्र ने बहुत-से नाराच, अर्धनाराच, शीघ्रकारी वत्सदन्त और कारीगर द्वारा साफ किये हुए बाणों से धृष्‍टधुम्न के चारों घोड़ों को मारकर उसकी दोनों भुजाओं और छाती में भी चोट पहुँचायी ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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