महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 164 श्लोक 1-13

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चतु:षष्‍टयधिकशततम (164) अध्याय: शान्ति पर्व (आपद्धर्म पर्व)

महाभारत: शान्ति पर्व: चतु:षष्‍टयधिकशततम अध्याय: श्लोक 1-13 का हिन्दी अनुवाद

नृशंस अर्थात् अत्‍यन्‍त नीच पुरूष के लक्षण

युधिष्ठिर ने पूछा– भरतनन्दन! सदा श्रेष्‍ठ पुरूषों के सेवन और दर्शन से मैं इस बात को तो जानता हूं कि कोमलता पूर्ण बर्ताव कैसे किया जाता है? परंतु नृशंस मनुष्‍यों और उनके कर्मों का मुझे विशेष ज्ञान नहीं है। जैसे मनुष्‍य रास्ते में मिले हुए कांटों, कुओं और आग को बचाकर चलते हैं, उसी प्रकार मनुष्‍य नृशंस कर्म करने वाले पुरूष को भी दूर से ही त्‍याग देते हैं । भारत! कुरूनन्दन! नृशंस मनुष्‍य इस लोक और परलोक में भी सदा ही शोक की आग से जलता रहता है; अत: आप मुझे नृशंस मनुष्‍य और उसके धर्म–कर्म का यथार्थ परिचय दीजिये। भीष्‍म जी ने कहा- राजन्! जिसके मन में बडी घृणित इच्‍छाएं रहती हैं, जो हिंसा प्रधान कुत्सित कर्मों को आरम्‍भ करना चाहता है, स्‍वयं दूसरों की निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन्दा करते हैं, जो अपने को दैव से वञ्चित समझता और पाप में प्रवृत होता है, दिये हुए दान का बारंबार बखान करता हैं, जिसके मन में विषमता भरी रहती है, जो नीच कर्म करने वाला, दूसरों की जीविका का नाश करने वाले और शठ है, भोग्‍य वस्‍तुओं को दूसरों को दिये बिना ही अकेले भोगता है, जिसके भीतर अभिमान भरा हुआ है, जो विषयों में आसक्‍त और अपनी प्रशंसा के लिये व्‍यर्थ ही बढ़–बढ़कर बातें बनाने वाला है, जिसके मन में सबके प्रति संदेह बना रहता है, जो कौए की तरह वंचक दृष्टि रखने वाला है, जिसमें कृपणता कूट–कूटकर भरी है, जो अपनें ही वर्ग के लोगों की प्रशंसा करता, सदा आश्रमों से द्वेष रखता और वर्ण संकरता फैलाता है, सदा हिंसा के लिये ही जिसका घूमना–फिरना होता है, जो गुण को भी अवगुण के समान समझता और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मन में उदारना नहीं है और जो अत्‍यन्‍त लोभी है, ऐसा मनुष्‍य ही नृशंस कर्म करने वाला कहा गया है। वह धर्मात्‍मा और गुणवान पुरूष को ही पापी मानता है और अपने स्‍वभाव को आदर्श मानकर किसी पर विश्‍वास नहीं करता है। जहां दूसरों की बदनामी होती हो, वहां उनके गुप्‍त दोषों को भी प्रकट कर देता है और अपने तथा दूसरे के अपराध बारबार होने पर भी वह आजीविका के लिये दूसरे का ही सर्वनाश करता है। जो उसका उपकार करता है, उसको वह अपने जाल में फंसा हुआ समझता है और उपकारी को भी यदि कभी धन देता है तो उसके लिये बहुत समय तक पश्‍चात्ताप करता रहता है। जो मनुष्‍य दूसरों के देखते रहने पर भी उत्तम भक्ष्‍य, पेय, लेह्य तथा दूसरे–दूसरे भोज्‍य पदार्थों को अकेला ही खा जाता है, उसको भी नृशंस ही कहना चाहिये। जो पहले ब्राह्मण को देकर पीछे अपने सुहृदों के साथ स्वयं भोजन करता है, वह इस लोक में अनन्त सुख भोगता है और मृत्यु के पश्‍चात् स्वर्ग लोक में जाता है। भरतश्रेष्‍ठ! इस प्रकार तुम्‍हारे प्रश्‍न के अनुसार यहां नृशंस मनुष्‍य का परिचय दिया गया है। विज्ञ पुरूष को चाहिये कि वह सदा उससे बचकर रहे।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्व के अन्‍तर्गत आपद्धर्मपर्व में नृशंस का वर्णन विषयक एक सौ चौसठवां अध्‍याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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