श्रीमद्भागवत महापुराण दशम स्कन्ध अध्याय 75 श्लोक 1-16

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दशम स्कन्ध: पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः(75) (उत्तरार्ध)

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कन्ध: पञ्चसप्ततितमोऽध्यायःश्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद


राजसूय यज्ञ की पूर्ति और दुर्योधन का अपमान

राजा परीक्षित् ने पूछा—भगवन्! अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञमहोत्सव को देखकर, जितने मनुष्य, नरपति, ऋषि, मुनि और देवता आदि आये थे, वे सब आनन्दित हुए। परन्तु दुर्योधन को बड़ा दुःख, बड़ी पीड़ा हुई; यह बात मैंने आपके मुख से सुनी है। भगवन्! आप कृपा करके इसका कारण बतलाइये ।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम्हरे दादा युधिष्ठिर बड़े महात्मा थे। उनके प्रेमबन्धन से बँधकर सभी बन्धु-बन्धावों ने राजसूय यज्ञ में विभिन्न सेवाकार्य स्वीकार किया थ ।

भीमसेन भोजनालय की देख-रेख करते थे। दुर्योधन कोषाध्यक्ष थे। सहदेव अभ्यागतों के स्वागत-सत्कार में नियुक्त थे और नकुल विविध प्रकार की सामग्री एकत्र करने का काम देखते थे ।अर्जुन गुरुजनों की सेवा-शुश्रूषा करते थे और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आये हुए अतिथियों के पाँव पखारने का काम करते थे। देवी द्रौपदी भोजन परसने का काम करतीं और उदारशिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे । परीक्षित्! इसी प्रकार सात्यिक, विकर्ण, हार्दिक्य, विदुर, भूरिश्रवा आदि बाह्लीक के पुत्र और सन्तर्दन आदि राजसूय यज्ञ में विभिन्न कर्मों में नियुक्त थे। वे सब-के-सब वैसा ही काम करते थे, जिससे महाराज युधिष्ठिर का प्रिय और हित हो ।

परीक्षित्! जब ऋत्विज्, सदस्य और बहुज्ञ पुरुषों तथा अपने इष्ट-मित्र एवं बन्धु-बान्धवों का सुमधुर वाणी, विविध प्रकार की पूजा-सामग्री और दक्षिणा आदि से भलीभाँति सत्कार हो चुका था शिशुपाल भक्तवत्सल भगवान के चरणों में समा गया, तब धर्मराज युधिष्ठिर गंगाजी में यज्ञान्त-स्नान करने गये । उस समय जब वे अवभृथ-स्नान करने लगे, तब मृदंग, शंख, ढोल, नौबत, नगारे और नर्तकियाँ आनन्द से झूम-झूमकर नाचने लगीं। झुंड-के-झुंड गवैये गाने लगे और वीणा, बाँसुरी तथा झाँझ-मँजीरे बजने लगे। इनकी तुमुल ध्वनि सारे आकाश में गूँज गयी । सोने के हार पहने हुए यदु, सृंजय, कम्बोज, कुरु, केकय और कोसल देश के नरपति रंग-बिरंगी ध्वजा-पताकाओं से युक्त और खूब सजे-धजे गजराजों, रथों, घोड़ों तथा सुसज्जित वीर सैनिकों के साथ महाराज युधिष्ठिर को आगे करके पृथ्वी को कँपाते हुए चल रहे थे । यज्ञ के सदस्य ऋत्विज् और बहुत-से श्रेष्ठ ब्राम्हण वेदमन्त्रों का ऊँचे स्वर से उच्चारण करते हुए चले। देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व आकाश से पुष्पों की वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे । इन्द्रप्रस्थ के नर-नारी इत्र-फुलेल, पुष्पों के हार, रंग-बिरंगे वस्त्र और बहुमूल्य आभूषणों से सज-धजकर एक-दूसरे पर जल, तेल, दूध, मक्खन आदि रस डालकर भिगो देते, एक-दूसरे के शरीर में लगा देते और इस प्रकार क्रीडा करते हुए चलने लगे । वारांगनाएँ पुरुषों को तेल, गोरस, सुगन्धित जल, हल्दी और गाढ़ी केसर मल देतीं और पुरुष भी उन्हें उन्हीं वस्तुओं से सराबोर कर देते ।उस समय इस उत्सव को देखने के लिये जैसे उत्तम-उत्तम विमानों पर चढ़कर आकाश में बहुत-सी देवियाँ आयी थीं, वैसे ही सैनिकों के द्वारा सुरक्षित इन्द्रप्रस्थ की बहुत-सी राजमहिलाएँ भी सुन्दर-सुन्दर पालकियों पर सवार होकर आयी थीं। पाण्डवों के ममेरे भाई श्रीकृष्ण और उनके सखा उन रानियों के ऊपर तरह-तरह के रंग आदि डाल रहे थे। इससे रानियों के मुख लजीली मुसकराहट से खिल उठते थे और उनकी बड़ी शोभा होती थी ।






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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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