महाभारत द्रोण पर्व अध्याय 127 श्लोक 59-74

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सप्तविंशत्यधिकशतकम (127) अध्याय: द्रोण पर्व (जयद्रथवध पर्व)

महाभारत: द्रोण पर्व: सप्तविंशत्यधिकशतकम अध्याय: श्लोक 59-74 का हिन्दी अनुवाद

आपके पुत्र की चलायी हुई उस महाशक्ति को अपने ऊपर आती देख भीमसेन ने उसके दो टुकड़े कर दिये। वह एक अद्भुत सी बात हुई। फिर अत्यन्त क्रोध में भरे हुए बलवान् भीम ने दूसरे तीन तीखे बाणों द्वारा कुण्डभेदी, सुषेण तथा दीर्घलोचन ( दीर्घलोमा ) - इन तीनों को मार डाला (जो आपके पुत्र थे )। तत्पश्चात् आपके ( अन्य ) वीर पुत्रों के युद्ध करते रहने पर भी उन्होंने पुनः कुरुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले वीर वृन्दारक का वध कर दिया। इसके बाद भीमसेन ने पुनः तीन बाण मारकर अभ, रौद्रकर्मा तथा दुर्विमोचन ( दुर्विरोचन ) - आपके इन तीन पुत्रों को भी मार गिराया। महाराज ! अत्यन्त बलवान् भीमसेन के बाणों से घायल होते हुए आपके पुत्रों ने योद्धाओं में श्रेष्ठ भीमसेन को फिर चारों ओर से घेर लिया। जैसे वर्षा ऋतु में मेघ पर्वत पर जलधाराओं की वर्षा करते हैं, उसी प्रकार वे आपके पुत्र युद्धस्थल में भयंकर कर्म करने वाले पाण्डुपुत्र भीमसेन पर बाणों की वर्षा करने लगे। जैसे पत्थरों की वर्षा ग्रहण करते हुए पर्वत को कोई पीड़ा नहीं होती, उसी प्रकार शत्रुसूदन पाण्डुपुत्र भीमसेन उस बाण वर्षा को सहन करते हुए भी व्यथित नहीं हुए। कुन्तीनन्दन भीम ने हँसते हुए ही अपने बाणों द्वारा एक साथ आये हुए दोनों भाई विन्द और अनुविन्द को तथा आपके पुत्र सुवर्मा को भी यमलोक पहुँचा दिया।
भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर उन्होंने समरभूमि में आपके वीर पुत्र सुदर्शन ( उर्णनाभ ) को घायल कर दिया। इससे वह तुरंत ही गिरा और मर गया। इस प्रकार पाण्डु नन्दन भीमसेन ने सम्पूर्ण दिशाओं में दृष्टिपात करके अपने बाणों द्वारा थोड़े ही समय में उस रथ सेना को नष्ट कर दिया। प्रजानाथ ! तदनन्तर भीमसेन के रथ की घरघराहट और गर्जना से समरांगण में मृगों के समान भयभीत हुए आपके पुत्रों का उत्साह भंग हो गया। वे सब के सब भीमसेन के भय से पीडि़त हो सहसा भाग खड़े हुए। कुन्ती कुमार भीमसेन ने आपके पुत्रों की विशाल सेना का दूर तक पीछा किया। राजन् ! उन्होंने रण क्षेत्र में सब ओर कौरवों को घायल किया। महाराज ! भीमसेन के द्वारा मारे जाते हुए आपके सभी पुत्र उन्हें छोड़कर अपने उत्तम घोड़ों को हाँकते हुए रण भूमि से दूर चले गये। उन सबको संग्राम में पराजित करके महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेन ने अपनी भुजाओं पर ताल ठोकी और सिंह के समान गर्जना की। बड़े जोर से ताली बजाकर महाबली भीम ने रथ सेना को डरा दिया और श्रेष्ठ श्रेष्ठ योद्धाओं को चुन चुन कर मारा। फिर समस्त रथियों को लाँघकर द्रोणाचार्य की सेना पर धावा बोल दिया।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्व के अन्तर्गत जयद्रथ वध पर्व में भीमसेन का प्रवेश और भयंकर पराक्रम विषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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