श्रीमद्भागवत महापुराण एकादश स्कन्ध अध्याय 4 श्लोक 8-16

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एकादश स्कन्ध: चतुर्थोऽध्यायः (4)

श्रीमद्भागवत महापुराण: एकादश स्कन्ध: चतुर्थोऽध्यायः श्लोक 8-16 का हिन्दी अनुवाद


आदिदेव नर-नारायण ने यह जानकार कि यह इन्द्र का कुचक्र है, भय से काँपते हुए काम आदि से हँसकर कहा—उस समय उनके मन में किसी प्रकार का अभिमान या आश्चर्य नहीं था। ‘कामदेव, मलय-मारुत और देवांगनाओ! तुम लोग डरो मत; हमारा आतिथ्य स्वीकार करो। अभी यहीं ठहरों, हमारा आश्रम सूना मत करो’। राजन्! जब नर-नारायण ऋषि ने उन्हें अभयदान देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव आदि के सिर लज्जा से झुक गये। उन्होंने दयालु भगवान नर-नारायण से कहा—‘प्रभो! आपके लिये यह कोई आशचर्य की बात नहीं है। क्योंकि आप माया से परे और निर्विकार हैं। बड़े-बड़े आत्माराम और धीर पुरुष निरन्तर आपके चरणकमलों में प्रणाम करते रहते हैं । आपके भक्त आपकी भक्ति के प्रभाव से देवताओं की राजधानी अमरावती का उल्लंघन करके आपके परम-पद को प्राप्त होते हैं। इसलिये जब वे भजन करने लगते हैं, तब देवता लोग तरह-तरह से उनकी साधना में विघ्न डालते हैं। किन्तु जो लोग केवल कर्मकाण्ड में लगे रहकर यज्ञादि के द्वारा देवताओं को बलि के रूप में उनका भाग देते रहते हैं, उन लोगों के मार्ग में वे किसी प्रकार का विघ्न नहीं डालते। परन्तु प्रभो! आपके भक्तजन उनके द्वारा उपस्थित की हुई विघ्न-बाधाओं से गिरते नहीं। बल्कि आपके करकमलों की छत्रछाया में रहते हुए वे विघ्नों के सिर पर पैर रखकर आगे बढ़ जाते हैं, अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होते ।

बहुत-से लोग तो ऐसे होते अं जो भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी एवं आँधी-पानी के कष्टों को तथा रसनेंद्रिय और जननेन्द्रीय के वेगों को, जो अपार समुद्रों के समान हैं, सह लेते हैं—पार कर जाते हैं। परन्तु फिर भी वे उस क्रोध के वश में हो जाते हैं, जो गाय के खुर से बने गड्ढ़े के समान है और जिससे कोई लाभ नहीं है—आत्मनाशक है। और प्रभो! वे इस प्रकार अपनी कठिन तपस्या को खो बैठते हैं जब कामदेव, वसन्त आदि देवताओं ने इस प्रकार स्तुति की तब सर्वशक्तिमान् भगवान ने अपने योगबल से उनके सामने बहुत-सी ऐसी रमणियाँ प्रकट करके दिखालायीं, जो अद्भुत रूप-लावण्य से सम्पन्न और विचित्र वस्त्रालंकारों से सुसज्जित थीं तथा भगवान की सेवा कर रही थीं । जब देवराज इन्द्र के अनुचरों ने उन लक्ष्मीजी के समान रूपवती स्त्रियों को देखा, तब उनके महान् सौन्दर्य के सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीर से निकलने वाली दिव्य सुगन्ध से मोहित हो गये । अब उनका सिर झुक गया। देवदेवेश भगवान नारायण हँसते हुए-से उनसे बोले—‘तुम लोग इनमें से किसी एक स्त्री को, जो तुम्हारे अनुरूप हो, ग्रहण कर लो। वह तुम्हारे स्वर्ग-लोक की शोभा बढ़ाने वाली होगी । देवराज इन्द्र के अनुचरों ने ‘जो आज्ञा’ कहकर भगवान के आदेश को स्वीकार किया तथा उन्हें नमस्कार किया। फिर उनके द्वारा बनायी हुई स्त्रियों में से श्रेष्ठ अप्सरा उर्वसी को आगे करके वे स्वर्गलोक में गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्र को नमस्कार किया तथा भरी सभा में देवताओं के सामने भगवान नर-नारायण के बल और प्रभाव का वर्णन किया। उसे सुनकर देवराज इन्द्र अत्यन्त भयभीत और चकित हो गये ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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