महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 96 भाग 8

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षण्णवतितम (96) अध्याय: अनुशासन पर्व (दानधर्म पर्व)

महाभारत: अनुशासन पर्व: षण्णवतितम अध्याय: भाग-8 का हिन्दी अनुवाद

जो शुभ कर्म का आचरण करता है, उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है और जो अशुभ कर्म करता है, वह अशुभ फल का भागी होता है। अतः जो अपना कल्याण चाहता हो, वह शुभ कर्मों का ही आचरण करे। अशुभ कर्मों का त्याग दे। ऐसा करने से वह शुभ फलों ही प्राप्त कर सकेगा । मनुष्य को चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियों को वश में करके शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न हो। शास्त्र के ज्ञान से ही मनुष्य को अनामय गति की प्राप्ति हो सकती है । साधु पुरूष जिसका अन्वेषण करते हैं, वह परम गति शास्त्रों में देखी गयी है। जहां पहुंचकर मनुष्य अनन्त दुःख का परित्याग करके अमरत्व को प्राप्त कर लेता है । इस धर्म का आश्रय लेकर पाप योनि में उत्पन्न हुए पुरूष तथा स्त्रियां, वैश्‍य और शूद्र भी परम गति को प्राप्त कर लेते हैं। फिर जो विद्वान ब्राह्माण अथवा बहुश्रुत क्षत्रिय है, उसकी सदगति के विषय में क्या कहना है। जिस देहधारी के पाप क्षीण नहीं हुए हैं उसे ज्ञान नहीं होता। जब मनुष्य को ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, तब वह कृतकृत्य हो जाता है । ज्ञान या विज्ञान को प्राप्त कर लेने पर भी दोष दृष्टि से रहित हो गुरूजनों के प्रति पहले जैसा ही सद्भाव रखे। अथवा एकाग्रचित्त होकर पहले से भी अधिक श्रद्वाभाव रखे । शिष्य जिस तरह गुरू का अपमान करता है, उसी प्रकार गुरू भी शिष्‍यों के प्रति बर्ताव करता है। अर्थात शिष्य को अपने कर्म अनुसार फल मिलता है। गुरू का अपमान करने वाले शिष्य का किया हुआ वेद शास्त्रों का अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञान रूप में परिणित हो जाता है। वह नरक में जाने के लिये अशुभ मार्ग को ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। उसका पुण्य नष्ट हो जाता है और ज्ञान अज्ञान हो जाता है । जिसने पहले कभी कल्याण का दर्शन नहीं किया है ऐसा मनुष्य शास्त्रोक्त विधि को न देखने के कारण अभिमान वश मोह को प्राप्त हो जाता है। अतः उसे तत्वाज्ञान की प्राप्ति नहीं होती । अत किसी को भी ज्ञान का अभिमान नहीं करना चाहिये। ज्ञान का फल है शांति, इसलिये सदा शांति के लिये ही प्रयत्न करें । मन का निग्रह और इन्द्रियों का संयम करके सदा क्षमाशील तथा अदोषदर्शी होकर गुरूजनों की सेवा करनी चाहिये । धैर्य के द्वारा उपस्थ और उदर की रक्षा करे। नेत्रों के द्वारा हाथ ओर पैरों की रक्षा करे। मन से इन्द्रियों के विषयों का बचावे और मन को बुद्धि में स्थापित करें । पहले शुद्ध और घिरे हुए स्थानों में जाकर आसन ले, उसके ऊपर धैर्यपूर्वक बैठें और शास्त्रोक्त विधि के अनुसार ध्यान के लिये प्रयत्न करें। विवेकयुक्त साधक अपने हृदय में विराजमान परमात्मदेव का साक्षात्कार करे। जैसे आकाश में विद्युत का प्रकाश देखा जाता है तथा जिस प्रकार किरणों वाले सूर्य प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार उस परमात्म देव को धूम रहित अग्नि की भांति तेजस्वी स्वरूप से प्रकाशित देखें। हृदय देश में विराजमान उन अविनाशी सनातन परमेश्‍वर का बुद्विरूपी नेत्रों के द्वारा दर्शन करे । जो योग युक्त नहीं है ऐसा पुरूष अपने हृदय में विराजमान उस महेश्‍वर का साक्षात्कार नहीं कर सकता। योग युक्त पुरूष ही मन को हृदय में स्थापित करके बुद्वि के द्वारा उस अन्‍तर्यामी परमात्मा का दर्शन करता है ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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