महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 70 श्लोक 1-10

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सप्ततितम (70) अध्याय: उद्योग पर्व (यानसंधि पर्व)

महाभारत: उद्योग पर्व: सप्ततितम अध्याय: श्लोक 1-10 का हिन्दी अनुवाद

भगवान् श्रीकृष्‍ण के विभिन्न नामों का व्युत्पत्तियों का कथन

धृतराष्‍ट्र बोले- संजय! तुम भगवान् श्रीकृष्‍ण के नाम और कर्मों का अभिप्राय जानते हो, अत: मेरे प्रश्‍न के अनुसार एक बार पुन: कमलनयन भगवान् श्रीकृष्‍ण का वर्णन करो।

संजय ने कहा- राजन्! मैंने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्‍ण के नामों की मङ्गलमयी व्युत्पत्ति सुन रक्खी है, उसमें जितना मुझे स्मरण है, उतना बता रहा हूं। वास्तव में तो भगवान् श्रीकृष्‍ण समस्त प्राणियों की पहुंच से परे हैं। भगवान् समस्त प्राणियों के निवास स्थान हैं तथा वे सब भूतों मे वास करते हैं, इसलिये ‘वसु’ हैं एवं देवताओं की उत्पत्ति के स्थान होने से और समस्त देवता उनमें वास करते हैं, इसलिये उन्हें ‘देव’ कहा जाता है। अतएव उनका नाम ‘वासुदेव’ है, ऐसा जानना चाहिये। बृहत् अर्थात् व्यापक होने के कारण वे ही ‘विष्‍णु’ कहलाते हैं । भारत! मौन, ध्‍यान और योग्य से उनका बोध अथवा साक्षात्कार होता है; इसलिये आप उन्हें ‘माधव’ समझें। मधु शब्द से प्रतिपादित पृ‍थ्‍वी आदि सम्पूर्ण तत्त्वों के उत्पादन एवं अधिष्‍ठान होने के कारण मधुसूदन श्रीकृष्‍ण को ‘मधुहा’ कहा गया है। ‘कृष्’ धातु सत्ता अर्थ का वाचक है और ‘ण’ शब्द आनन्द अर्थ का बोध कराता है, इन दोनों भावों से युक्त होने के कारण यदुकुल में अवतीर्ण हुए नित्य आनन्दस्वरूप श्रीविष्‍णु ‘कृष्‍ण’ कहलाते हैं। नित्य, अक्षय, अविनाशी एवं परम भगवद्धाम का नाम पुण्‍डरीक है। उसमें स्थित होकर जो अक्षतभाव से विराजते हैं, वे भगवान् ‘पुण्‍डरीकाक्ष’ कहलाते हैं। (अथवा पुण्‍डरीक-कमल के समान उनके अक्षि- नेत्र हैं, इसलिये उनका नाम पुण्‍डरीकाक्ष हैं)। दस्युजनों को त्रास (अर्दन या पीड़ा) देने के कारण उनको ‘जनार्दन’ कहते हैं ।।६।। वे सत्य से कभी च्युत नहीं होते और न सत्त्व से अलग ही होते हैं, इसलिये सद्भाव के सम्बन्ध से उनका नाम ‘सात्वत’ है। आर्ष कहते हैं वेद को, उससे भासित होने के कारण भगवान् का एक नाम ‘आर्षभ’ हैं। आर्षभ के योग से ही वे ‘वृषभेक्षण’ कहलाते हैं (वृषभ का अर्थ है वेद, वही् ईक्षण-नेत्र के समान उनका ज्ञापक है; इस व्युत्पत्ति के अनुसार वृषभेक्षण नाम की सिद्धि होती है)। शत्रु सेनाओं पर विजय पाने वाले ये भगवान् श्रीकृष्‍ण किसी जन्मदाता के द्वारा जन्म ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिये ‘अज’ कहलाते हैं। देवता स्वयं प्रकाशरूप होते हैं, अत: उत्कृष्‍ट रूप से प्रकाशित होने के कारण भगवान् श्रीकृष्‍ण को ‘उदर’ कहा गया है और दम (इन्द्रियसंयम) नामक गुण से सम्पन्न होने के कारण उनका नाम ‘दाम’ है। इस प्रकार दाम और उदर इन दोनों शब्दों के संयोग से वे ‘दामोदर’ कहलाते हैं। वे हर्ष अथवा सुख से यु‍क्त होने के कारण हृषीक हैं और सुख-ऐश्‍वर्य से सम्पन्न होने के कारण ‘ईश’ कहे गये हैं। इस प्रकार वे भगवान् ‘हृषीकश’ नाम धारण करते हैं। अपनी दोनों बाहुओं द्वारा भगवान् इस पृथ्‍वी और आकाश को धारण करते हैं, इसलिये उनका नाम ‘महाबाहु’ हैं। श्रीकृष्‍ण कभी नीचे गिरकर क्षीण नहीं होते, अत: (‘अधो न क्षीयते जातु’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार) ‘अधोक्षज’ कहलाते हैं। वे नरों (जीवात्माओं) के अयन (आश्रय) हैं, इसलिये उन्हें ‘नारायण’ भी कहते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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