महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 342 श्लोक 44-49

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द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततम (342) अध्याय: शान्ति पर्व (मोक्षधर्म पर्व)

महाभारत: शान्ति पर्व: द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततम अध्याय: श्लोक 34-43 का हिन्दी अनुवाद

तदनन्तर देवताओं और ऋषियों ने आयु के पुत्र नहुष को देवराज के पद पर अभिषिक्त कर दिया। नहुष के ललाट में समसत प्राणियों के तेज को हर लेने वाली पाँच सौ प्रज्वलित ज्योतियाँ जगमगाती रहती थीं। उनके द्वारा वे स्वर्ग के राज्य का पालन करने लगे। ऐसा होने पर सभी स्वाभाविक स्थिति में आ गये। सभी स्वस्थ एवं प्रसन्न हो गये। कुछ काल के पश्चात् नहुष ने देवताओं से कहा- ‘इन्द्र के उपभोग में आने वाली अन्य सारी वस्तुएँ तो मेरी सेवा में उपस्थित हैं। केवल शची मुझे नहीं मिली हैं।’ ऐसा कहकर वे शची के पास गये और उनसे बोले - ‘सौभाग्यशालिनि ! मैं देवताओं का राजा इन्द्र हूँ। मेरी सेवा स्वीकार करो।’ शची ने उत्तर कदया- ‘महाराज ! आप स्वभाव से ही धर्मवत्सल और चन्द्रवंश के रत्न हैं। आपको परायी स्त्री पर बलात्कार नहीं करना चाहिये’। तब नहुष ने शची से कहा - ‘देवि ! इस समय मैं इन्द्र पद पर प्रतिष्ठित हूँ। इन्द्र के राज्य और रत्न दोनों का अधिकारी हो गया हूँ; अतः तुम्हारे साथ समागम करने में कोई अधर्म नहीं है; क्योंकि तुम इन्द्र के उपभोग मेें आयी हुई वस्तु हो।’ यह सुनकर शची ने कहा- ‘महाराज ! मैंने एक व्रत ले रखा है। वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। उसकी समाप्ति हो जाने पर कुछ ही दिनों में मैं अपकी सेवा में उपस्थित होऊँगी।’ शची के ऐसा कहने पर नहुष चले गये। इसके बाद नहुष के भय से डरी हुई शची दुःख-शोक से आतुर तथा पति के दर्शन के लिये उत्कण्ठित हो बृहस्पतिजी के पास गयीं। उन्हें अत्यन्त उद्विग्न देख बृहस्पतिजी ने ध्यानस्थ होकर यह जान लिया कि यह अपने स्वामी के कार्य साधन में लगी हुई है। तब उन्होंने शची से कहा’ ‘देवि ! इसी व्रत और तपस्या से सम्पन्न हो तुम वरदायिनी देवी उपश्रुति का आव्हान करो, तब वह तुम्हें इन्द्र का दर्शन करायेगी’। गुरु का यह आदेश पाकर महान् नियम में तत्पर हुई शची ने मन्त्रों द्वारा वरदायिनी देवी उपश्रुति का आव्हान किया, तब उपश्रुति देवी शची के समीप आयीं और उनसे इस प्रकार बोलीं - ‘इन्द्राणी ! यह मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूँ। तुमने बुलाया कौन-सा प्रिय कार्य करूँ ?’ शची ने देवी के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया और कहा - ‘भगवति ! आप मुझे मेरे पति के दर्शन कराने की कृपा करें। आप की ऋत और सत्य हैं।’ उपश्रुति शची को मानसरोवर पर ले गयीं। वहाँ उसने मृणाल की ग्रन्थियों में छिपे हुए इन्द्र का उन्हें दर्शन करा दिया। अपनी पत्नि शची को दुर्बल और दुखी देख इन्द्र मन-ही-मन कहने लगे- ‘अहो ! यह बड़े दुःख की बात है कि मैं यहाँ छिपा हुआ बैठा हूँ और मेरी य िपत्नी दःख से आतुर हो मुझे ढूँढ़ती हुई यहाँ तक आयी है।’ इस प्रकार खेद प्रकट करके इन्द्र ने अपनी पत्नी से कहा - ‘देवी ! कैसे दिन बिता रही हो ?’ शची बोली- ‘प्राणनाथ ! राजा नहुष इन्द्र बना बैठर है और मुझे अपनी पत्नी बनाने के लिये बुला रहा है। इसके लिये मुझे कुछ ही दिनों का समय मिला है और मैंने नियत समय के बाद उसकी बात मानने का वचन दे दिया है।’ ‘तब इन्द्र ने उनसे कहा ‘जाओ और नहुष से इस प्रकार कहो- ‘राजन् ! आप ऋषियों से जुते हुए अपूर्व वाहन पर आरूढ़ होकर आइये और मुण्े अपनी सेवा में ले चलिये। इन्द्र के पास मन को प्रिय लगने वाले बड़े-बड़े वाहन हैं, किंतु उन सब पर मैं आरूढ़ हो चुकी हूँ, अतः आप उन सबसे भिन्न किसी और ही विलक्षएा वाहन से मेरे पास आइये।’ इन्द्र के इस प्राकर सुझाव देने पर शची हर्ष पूर्वक लौट गयीं और इन्द्र भी पुनः उन कमलनाल की ग्रन्थि में ही प्रविष्ट हो गये।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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