महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 83 श्लोक 61-72

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त्र्यशीति (83) अध्‍याय: उद्योग पर्व (भगवादयान पर्व)

महाभारत: उद्योग पर्व: त्र्यशीति अध्याय: श्लोक 61-72 का हिन्दी अनुवाद

पूर्वोक्त रूप से खड़े हुए उन समस्त महर्षियों को प्रणाम करके उनका समादर करते हुए बोले- 'महात्माओं ! सम्पूर्ण लोकों मे कुशल तो है न ? क्या धर्म का अच्छी तरह अनुष्ठान हो रहा है ? क्षत्रिय आदि तीनों वर्ण ब्राह्मणों की आज्ञा के अधीन रहते है न ? क्या पितरों, देवताओं और अतिथियों की पूजा भली-भांति सम्पन्न हो रही है ?'राजाओं तत्पश्चात उन महर्षियों की पूजा करके भगवान मधुसूदन ने फिर उनसे पूछा– 'महात्माओं ! आपने कहाँ सिद्धि प्राप्त की है ? आप लोगों का यहाँ कौन सा मार्ग है ? अथवा आप लोगों का क्या कार्य है ? भगवन ! मैं आप लोगों की क्या सेवा करूँ ? किस प्रयोजन से आप लोग इस भूतल पर पधारें हैं ?' श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर कठोर व्रत धारण करने वाले नारद आदि सब महर्षि उनका अभिनंदन करने लगे ॥ ( नारदजी के अतिरिक्त जो महर्षि वहाँ उपस्थित थे, उनके नाम इस प्रकार हैं - ) अध:शिरा:, सर्पमाली, महर्षि देवल, अर्वावसु, सुजानु, मैत्रेय, शूनक, बली, दल्भ्पुत्र बक, स्थूलशिरा:, पराशरनन्दन श्रीकृष्णद्वैपायन, आयोदधौम्य, धौम्य, अणिमाण्ड्व्य, कौशिक, दामोष्णीष त्रिषवण, पर्णाद, घटजुनाक, मौञ्जायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, शालिक, शीलवान, अशनि, धाता, शून्यपाल, अकृतव्रण, श्वेतकेतु, कहोल एवं महातपस्वी परशुराम॥ उस समय देवराज तथा डाइत्याराज के भी सखा जमदग्निनन्दन परशुराम ने मधुसूदन श्रीकृष्ण के पास जाकर उन्हें हृदय से लगाया और इस प्रकार कहा- ॥65॥ 'महामते केशव ! जिन्होनें पुरातन देवासुरसंग्राम को भी अपनी आँखों से देखा है, वे पुण्यात्मा देवर्षिगण, अनेक शास्त्रों के विद्वान ब्रहमर्षिगण तथा आपका समान करने वाले तपस्वी राजर्षिगण सम्पूर्ण दिशाओं से एकत्र हुए भूमंडल के क्षत्रिय नरेशों को, सभा में बैठे हुए भूपालों को तथा सत्यस्वरूप आप भगवान जनार्दन को देखना चाहते हैं । इस परम दर्शनीय वस्तु का दर्शन करने के लिए ही हम हस्तिनापुर में चल रहे हैं । शत्रुओं को संताप देने वाले माधव ! वहाँ कौरवों तथा अन्य राजों की मंडली में आपके द्वारा कही जाने वाली धर्म और अर्थ से युक्त बातों को हम सुनना चाहते हैं ।'यदुकुलसिंह ! वहाँ कौरव सभा में भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख व्यक्ति, परम बुद्धिमान विदुर तथा आप पधारेंगे । 'गोविंद ! माधव ! उस सभा में आपके तथा भीष्म आदि के मुख से जो दिव्य, सत्य एवं हितकर वचन प्रकट होंगे, उन सबको हम लोग सुनना चाहते हैं। 'महाबाहो ! अब हम लोग आप से पूछकर विदा ले रहे हैं, पुन: आपका दर्शन करेंगे । वीर ! आपकी यात्रा निर्विघ्न हो । जब सभा में पधारकर आप दिव्य आसन पर बैठे होंगे, उसी सामी बल और तेज से सम्पन्न आपके श्रीअंगों का हम पुन: दर्शन करेंगे'

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अंतर्गत भगवादयानपर्व में श्रीकृष्ण प्रस्थान विषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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