महाभारत कर्ण पर्व अध्याय 10 श्लोक 20-39

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दशम (10) अध्याय: कर्ण पर्व

महाभारत: कर्ण पर्व: दशम अध्याय: श्लोक 20-39 का हिन्दी अनुवाद

तत्पश्चात् अपने बाहुबल का आश्रय ले मन को सुस्थिर करके दुर्योधन ने राधा पुत्र कर्ण से बड़े प्रेम और सत्कार के साथ अपने लिये हितकर यथार्थ और मंगलकारक वचन इस प्रकार कहा -‘कर्ण ! मैं तुम्हारे पराक्रम को जानता हूँ और यह भी अनुभव करता हूँ कि मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह बहुत अधिक है। महाबाहो ! तथापि मैं तुमसे अपने हित की बात कहना चाहता हूँ। ‘वीर ! मेरी यह बात सुनकर तुम अपनी इच्छा के अनुसार जो तुम्हें अच्छा लगे, वह करो। तुम बहुत बड़े बुद्धिमान् तो हो ही, सदा के लिये मेरे सबसे बड़े सहारे भी हो। ‘मेरे दो सेनपति पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण, जो अतिरथी थे, युद्ध में मारे गये। अब तुम मेरे सेना नायक बनो; क्योंकि तुम उन दोनों से भी अधिक शक्तिशाली हो। ‘वे दोनों महाधनुर्धर होते हुए भी बूढ़े थे और अर्जुन के प्रति उनके मन में पक्षपात था। राधा नन्दन ! मैंने तुम्हारे करने से ही उन दोनों वीरों को सेनापति बनाकर सम्मानित किया था। ‘तात ! भीष्म ने पितामह के नाते की ओर दृष्टिपात करके उस महासमर में दस दिनों तक पाण्डवों की रक्षा की है । ‘उन दिनों तुमने हथियार रख दिया था; इसलिये महासमर में अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके पितामह भीष्म को मार डाला था। ‘पुरुषसिंह ! उन महाधनुर्धर भीष्म के घायल होकर बाण शय्या पर सो जाने के बाद तुम्हारे कहने से ही द्रोणाचार्य हमारी सेना के अगुआ बनाये गये थे। मेरा विश्वास है कि उन्होंने भी अपना शिष्य समझकर कुन्ती के पुत्रों की रक्षा की है। वे बूढ़े आचार्य भी शीघ्र ही धृष्टद्युम्न के हाथ से मारे गये। ‘अमित पराक्रमी वीर ! उन प्रधान सेनापतियों के मारे जाने के पश्चात् मैं बहुत सोचने पर भी समरांगण में तुम्हारे समान दूसरे किसी योद्धा को नहीं देखता। ‘हम लोगों में से तुम्हीं शत्रुओं पर विजय पाने में समर्थ हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तुमने पहले, बीच में और पीछे भी हमारा हित ही किया है। ‘तुम धुरन्धर पुरुष की भाँति युद्ध स्थल में सेना - संचालन का भार वहन करने के योग्य हो; इसलिये स्वयं ही अपने आपको सेनापति के पद पर अभिषिक्त कराओ। ‘जैसे अविनाशी भगवान् स्कन्द देवताओं की सेना का संचालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी धृतराष्ट्र पुत्रों की सेना को अपनी अध्यक्षता में ले लो। ‘जैसे देवता इन्द्र ने दानवों का संहार किया था, उसी प्रकार तुम भी समस्त शत्रुओं का वध करो। जैसे दानव भगवान् विष्णु को देखते ही भाग जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डव तािा पान्चाल महारथी तुम्हें रण भूमि में सेनापति के रूप में उपस्थित देखकर भाग खडत्रे होंगे; अतः पुरुषसिंह ! तुम इस विशाल सेना का संचालन करो। ‘तुम्हारे सावधानी के साथ खडत्रे होते ही मूर्ख पाण्डव, पान्चाल और सृंजय अपने मन्त्रियों सहित भाग जायँगे। ‘जैसे उदित हुआ सूर्य अपने तेज से तपकर घोर अंधकार को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओं को संतप्त एवं नष्ट करो’। संजय कहते हैं - राजन् ! आपके पुत्र के मन में जो यह प्रबल आशा हो गयी थी कि भीष्म और द्रोण के मारे जाने पर कर्ण पाण्डवों को जीत लेगा, वही आशा मन में लेकर उस समय उसने कर्ण से इस प्रकार कहा - ‘सूत पुत्र ! अर्जुन तुम्हारे सामने खड़े होकर कभी युद्ध करना नहीं चाहते हैं’ ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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